मंगलवार, 4 जुलाई 2017

जूता तो जूता है


((श्री मुकेश नेमा जी आबकारी आयुक्त ग्वालियर के फेसबुक पेज से ))

जूतों का सीधा संबंध मंदिरो से है ! बहुत से लोग मंदिर जाते ही इसलिये हैं क्योकि वे अपने फिलहाल पहने जा रहे जूतों से बोर हो चुके है और अपने लिये नये जूते चाहते हैं ! और बहुत से लोग केवल इसलिये मंदिर नही जाते क्योकि वे अपने जूतो से बहुत ज्यादा प्रेम करते है !
जूते इसलिये भी चुराये जाते है क्योकि इसमें थ्रिल है ! जूते चुराना एक बहुत बडा आर्ट है ! बेहद सावधान ,चतुर ,दूरदर्शी आदमी ही जूते चुरा सकता है ! किसी दूसरे के नये जूतो मे पैर डाल लेना ,ऐसा करते हुये देख लिये जाने पर अनजाने मे ऐसा कर जाने की एक्टिग करना हर किसी के बस की बात नही ! कला है ये और हर कलाकार की तरह जूते चुराने वालो भी अपनी प्रतिभा को निखारने के लिये नियमित रूप से मंदिर जाना होता है !
सफलता पूर्वक जूता चुरा लेने मे खुशी है वह कोई बडी परीक्षा पास कर लेने या गोल्ड मैडल जीतने से कम नही होती ! जूता चुराने वाले सच्चे देशभक्त हैं ! वे केवल यह चाहते हैं कि आप नये जूते खरीदे ! आप नये जूते खरीदेगे ! अर्थव्यवस्था गति पकडेगी ! देश आगे बढेगा !
भगवान भरोसे रहने वाला कोई भी आदमी कभी यह भरोसा नही कर पाता कि भगवान जी से मिलकर लौटने पर उसकी अपने प्रिय जूतों से फिर मुलाक़ात हो भी सकेगी या नही ,पर मंदिर जाने पर जूते तो उतारना ही पड़ते है ! वह भारी मन से उतारता है जूते ! वैसे ही निहारता है अपने जूतो को ,जिस तरह लाम पर जाता फ़ौजी मुडमुड कर अपना बीबी बच्चो को देखता है !
मेरे ख़्याल से जूते ही ज़िम्मेदार है जीवन मरण के सिलसिले के ! ये ना होते तो हम लोग कब के तर गये होते ! होता ये है कि दर्शन करते वक़्त ये मन मे इस कदर घुसे रहते है कि उसमें भगवान के रहने की जगह ही नही बचती ! भगवान के सामने हाथ जोड़े वक्त भी ध्यान भगवान के बजाय जूतों मे लगा रहता है ,चतुर भक्तगण पूरी कोशिश करते है कि उनके जूते उनके क़ाबू मे बने रहे ,वे आमतौर पर अपने जूते मंदिर के प्रवेश द्वार के एन सामने उतारते है ताकि भगवान और जूतों को एक साथ देखा जाना सँभव हो सके ,पर्याप्त सावधान भी बने रहते है पर भगवान की ही वजह से एकाध सैकेंड की चूक हो ही जाती है और भाई लोग आपके जूते पहन जाते है ,जूता चुराने वाले किसी भक्त की तुलना मे अपने लक्ष्य के प्रति ज्यादा एकाग्र और समर्पित होते है ! आप नंगे पाँव घर लौटते हैं और लौटते वक्त पूरे टाईम यह सोच सोच कर कन्फ़्यूज होते रहते है कि भगवान आपके और जूता चोर मे से किसका ज्यादा सगा है !
मंदिरों के जूता चोरों से अपने जूते बचाने के लिये श्रद्धालुओं द्वारा अनादि काल से तरह तरह से उपायों का अविष्कार किया जाता रहा है ,और इनमें से अपने दोनो पाँव के जूतों को एक दूसरे से अलग अलग ,पर्याप्त दूरी पर रख कर मंदिर मे प्रवेश करने का तरीका सर्वाधिक लोकप्रिय उपाय माना गया है ,मै खुद इस उपाय को आज़मा कर अनेक बार अपने जूतों को वापस पाने मे सफल हो चुका हूँ ,कुछ लोग मंदिर जाने के लिये फटे पुराने जूते इस्तेमाल करते है और बहुत बार यह तरीका भी कारगर होता है .जूता चोर आपकी ग़रीबी पर तरस खा कर आपको बख़्श देते है ,अपनी कार मे ही जूते उतार जाना भी अपने जूतों के साथ बने रहने के आजमाये हुये सफल तरीक़ों मे से एक है ! पर यदि आप बे कार है तो कार वाला फ़ार्मूला आपके लिये नही है !
आप अपनी सुविधानुसार ऊपर लिखे इन तरीक़ों मे से किसी को भी आज़मा सकते है पर ये हमेशा काम करेंगे इसकी कोई ग्यारंटी भगवान भी नही दे सकते !
सच्ची बात तो यह है कि जूते होते ही चोरी हो जाने के लिये हैं ! जूतों को चोरी होना है तो वे होगें ही ,मेरा यह मानना है कि मंदिर में प्रवेश करते वक्त ही यह मान लेना चाहिये कि ये जूते मुझसे पहले किसी और के थे और मेरे बाद किसी और के होगें ,इसीलिये इस क्या लाया है और क्या ले जायेगा टाईप के ज्ञान को मानने वाले सच्चे आराधक मंदिर मे भगवान के सामने होते वक्त जूतों को लेकर क़तई विचलित नही होते ,वे पूरी तन्मयता से भगवान का ध्यान करते है ,और मंदिर से बाहर निकलने पर यदि वे पाते है कि उनके जूते अन्तर्ध्यान हो चुके हैं तो वे उतनी ही तन्मयता से अन्य श्रध्दालुओं द्वारा उतारे गये जूतों के ढेर से ऐसे जूते तलाश करते है जो उनके अपने चोरी जा चुके जूतों से अधिक बेहतर और नये से हों ,वे उन्हे निसंकोच पहनते हैं और भगवान का आभारी होते हुये सकुशल घर लौट आते हैं ,मंदिर से जूते पहन कर लौटने का यह सर्वाधिक कारगर और लोकप्रिय तरीका है ,और मै खुद इसी उपाय पर भरोसा करता हूँ और मंदिर से दसियो बार जूते चोरी होने के बावजूद इसी उपाय की कृपा से कभी नंगे पाँव घर नही लौटा ,और जूते भी हमेशा नये के नये ही बने रहे ! चूँकि आप भी समझदार है इसलिये मुझे पूरा विश्वास है कि भविष्य मे जब भी ऐसा अवसर उपस्थित होगा आप भी मंदिर से लौटते वक्त बेहतर जूतों के साथ ही घर लौटेंगे

((श्री मुकेश नेमा जी आबकारी आयुक्त ग्वालियर के फेसबुक पेज से ))












आप और बाप

((श्री मुकेश नेमा जी आबकारी आयुक्त ग्वालियर के फेसबुक पेज से ))

बाप होना ,ख़ासकर अच्छा बाप होना दुनिया का सबसे मुश्किल काम है ! पता नही अब तक दुनिया मे किसी लड़के को अच्छा बाप मिला भी है या नही ,बाप जीते जी तो अच्छा बाप हो ही नही सकता ! मर जाये बाप तो लड़का तेरहवीं वग़ैरा से फ़ुर्सत हो ,तसल्ली से सोच विचार कर उसमे कुछ अच्छाइयाँ तलाश करने की कोशिश करता है ! जो लोग मिलने आते है ,उनसे बाप की तारीफ़े सुनता है ,सुनता है और हैरान होता है ,उसे भी लगने लगता है कि हो ना हो वो अच्छे आदमी ही थे ! बाप मे अच्छाइयाँ तलाश लेना बडा मुश्किल काम है ! पर बाप के छोड़े मकान ,दुकान थोड़ी बहुत श्रद्धा तो जगा ही देते है बाप के प्रति ,लड़का थोड़ा संवेदनशील हो तो बाप के कभी कभार मुस्कुराने को भी बाप के अच्छे दिल का प्रमाणपत्र मान लेता है ! 
जब तक आपके बाप मौजूद होते हैं ,आप सिटपिटाये और वो सन्नाये से रहते हैं ,और जब आपका बेटा आपके जूतों मे पाँव डाल देता है तो आपकी अपने बेटे से ठन जाती है ,आपके बाप ने आपको सुधारने के लिये जो जो नुस्ख़े आज़माये थे वे आप अपने बेटे पर आज़माना चाहते है ,वो सारी उम्मीदें लगा लेते हैं उससे ,जो आपके पिताश्री ने आप से लगाई थी ,और उन्हें साकार ना होते देख भुनभुनाते हुये मरे थे ! आप जब जीवन के मध्याह्न मे विचार करते है तो आप पाते है कि आप अच्छे बेटे तो नही ही हो सके और अच्छा बाप होना भी आपके बस की बात नही थी ! 
सुना है बाप और बेटे का रिश्ता तीर कमान सा होता है ,बाप होता है कमान और बेटा होता है तीर ,कमान की प्रत्यचां का तनाव सही हो तभी तीर सही निशाने पर लगता है ,पर हम भारतियों का रोना तो ये है कि ना हमारे बाप तीरंदाज़ हो सके और ना ही हम इस काम मे पारागंत होकर दिखा सके ! 
ये सारा खेल बस उम्मीदों का है ,हम बेटे से वो होने की उम्मीद करते है जो हम ख़ुद नही हो सके ,बेटे की मंशा कभी पूछते ही नही हम ,बेटे मे ख़ुद को देखते है और ये भी चाहते है वो हमारी सारी कमज़ोरियों से मुक्त हो ,उसकी कोई भी कमज़ोरी आपको अपने फ़ेल होने ,चूक जाने का अहसास कराती है ,आप उस पर नही ख़ुद पर नाराज़ होते हैं और उसी तरह नाराज़ बने रहते हैं जैसे आपके बाप हमेशा बने रहे थे ! 
आप भी ऐसे ही है ना ! होगें ही ,और कुछ हो भी नही सकता ! इसे लेकर ज़्यादा हैरान भी ना हों , इस मामले में ना ही हमारे बाप कुछ कर सके थे ना ही हम कर सकेंगे 

((श्री मुकेश नेमा जी आबकारी आयुक्त ग्वालियर के फेसबुक पेज से ))













शुक्रवार, 11 दिसंबर 2015

।। दान ।।

एक संत ने एक द्वार पर दस्तक दी और आवाज लगाई " भिक्षां देहि "।
▬ एक छोटी बच्ची बाहर आई और बोली,
‘‘बाबा, हम गरीब हैं, हमारे पास देने को कुछ नहीं है।’’
संत बोले, ‘‘बेटी, मना मत कर, अपने आंगन की धूल ही दे दे।’’
लड़की ने एक मुट्ठी धूल उठाई और भिक्षा पात्र में डाल दी।
शिष्य ने पूछा, ‘‘गुरु जी, धूल भी कोई भिक्षा है? आपने धूल देने को क्यों कहा?’’
संत बोले, ‘‘बेटे, अगर वह आज ना कह देती तो फिर कभी नहीं दे पाती।
आज धूल दी तो क्या हुआ, देने का संस्कार तो पड़ गया। आज धूल दी है, उसमें देने की भावना तो जागी ! कल समर्थवान होगी तो फल-फूल भी देगी।’’
जितनी छोटी कथा है निहितार्थ उतना ही विशाल...
साथ में आग्रह भी ....
दान करते समय दान हमेशा अपने परिवार के छोटे बच्चों के हाथों से दिलवाये ....जिससे उनमें देने की भावना बचपन से बने l

सोमवार, 30 नवंबर 2015

निदा फ़ाज़ली जी

: पेरिस हमले पर आज निदा फ़ाज़ली जी के ये दो
शेर याद आ रहे हैं -
हर बार ये इल्ज़ाम रह गया..!
हर काम में कोई काम रह गया..!!
नमाज़ी उठ उठ कर चले गये मस्ज़िदों से..!
दहशतगरों के हाथ में इस्लाम रह गया..!!
खून किसी का भी गिरे यहां
नस्ल-ए-आदम का खून है आखिर
बच्चे सरहद पार के ही सही
किसी की छाती का सुकून है आखिर
ख़ून के नापाक ये धब्बे, ख़ुदा से कैसे छिपाओगे?
मासूमों के क़ब्र पर चढ़कर, कौन से जन्नत जाओगे?
कागज़ पर रख कर रोटियाँ, खाऊँ भी तो कैसे . .
. . खून से लथपथ आता है, अखबार भी आजकल .
दिलेरी का हरगिज़ ये काम नहीं है
दहशत किसी मज़हब का पैगाम नहीं है ....!
तुम्हारी इबादत, तुम्हारा खुदा, तुम जानो..
हमें पक्का यकीन है ये कतई इस्लाम नहीं है....
एक साधु व एक डाकू एक ही दिन मरकर यमलोक पहुंचे. धर्मराज उनके कर्मों का लेखा-जोखा खोलकर बैठे थे और उसके हिसाब से उनकी गति का हिसाब करने लगे.
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निर्णय करने से पहले धर्मराज ने दोनों से कहा- मैं अपना निर्णय तो सुनाउंगा लेकिन यदि तुम दोनों अपने बारे में कुछ कहना चाहते हो तो मैं अवसर देता हूं, कह सकते हो.
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डाकू ने हमेशा हिंसक कर्म ही किए थे. उसे इसका पछतावा भी हो रहा था. अतः अत्यंत विनम्र शब्दों में बोला महाराज ! मैंने जीवन भर पापकर्म किए. जिसने केवल पाप ही किया हो वह क्या आशा रखे. आप जो दंड दें, मुझे स्वीकार है.
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डाकू के चुप होते ही साधु बोला महाराज ! मैंने आजीवन तपस्या और भक्ति की है. मैं कभी असत्य के मार्ग पर नहीं चला. सदैव सत्कर्म ही किए इसलिए आप कृपा कर मेरे लिए स्वर्ग के सुख-साधनों का शीघ्र प्रबंध करें.
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धर्मराज ने दोनों की बात सुनी फिर डाकू से कहा- तुम्हें दंड दिया जाता है कि तुम आज से इस साधु की सेवा करो. डाकू ने सिर झुकाकर आज्ञा स्वीकार कर ली.
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यमराज की यह आज्ञा सुनकर साधु ने आपत्ति जताते हुए कहा- महाराज ! इस पापी के स्पर्श से मैं अपवित्र हो जाऊंगा. मेरी तपस्या तथा भक्ति का पुण्य निरर्थक हो जाएगा. मेरे पुण्य कर्मों का उचित सम्मान नहीं हो रहा है.
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धर्मराज को साधु की बात पर बड़ा क्षोभ हुआ. वह क्षुब्ध होकर बोले- निरपराध व्यक्तियों को लूटने और हत्या करने वाला डाकू मर कर इतना विनम्र हो गया कि तुम्हारी सेवा करने को तैयार है.
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तुम वर्षों के तप के बाद भी अहंकार ग्रस्त ही रहे. यह नहीं जान सके कि सब में एक ही आत्मतत्व समाया हुआ है. तुम्हारी तपस्या अधूरी और निष्फल रही. अत: आज से तुम इस डाकू की सेवा करो, और तप को पूर्ण करो.
उसी तपस्या में फल है, जो अहंकार रहित होकर की जाए. अहंकार का त्याग ही तपस्या का मूलमंत्र है और यही भविष्य में ईश्वर प्राप्ति का आधार बनता है. झूठे दिखावे तप नहीं हैं, ऐसे लोगों की गति वही होगी जो साधु की हुई.

गुरुवार, 22 अक्टूबर 2015

टालस्टाय ने एक छोटी सी कहानी लिखी है। टालस्टाय ने लिखा है कि एक झील के किनारे तीन फकीर थे। तीनों बेपढ़े लिखे थे। लेकिन उनकी बड़ी ख्याति हो गई, और दूर दूर से लोग उनके दर्शन करने को आने लगे। तो रूस का जो सबसे बड़ा पुरोहित था, उसके कानों में भी खबर पहुंची कि तीन पवित्र पुरुष झील के उस पार हैं। पर उसने कहा कि मुझे उनका पता ही नहीं! और उन्होंने कभी चर्च में दीक्षा भी नहीं ली, वे पवित्र हो कैसे सकते हैं! और हजारों लोग वहां जा रहे हैं और दर्शन करके कृतार्थ हो रहे हैं! तो वह भी देखने गया कि मामला क्या है?
नाव पर सवार हुआ, झील के उस पर पहुंचा। वे तीनों तो बिलकुल बेपढ़े लिखे गंवार थे। वे अपने झाडू के नीचे बैठे थे। जब महापुरोहित उनके सामने गया तो उन तीनों ने झुककर उसको प्रणाम किया। महापुरोहित तभी आश्वस्त हो गया कि कोई डर की बात नहीं है। जब तीनों चरण छू रहे हैं, इनसे कोई ईसाई—धर्म को खतरा नहीं है। उस महापुरोहित ने कहा कि तुम क्या करते हो? क्या है तुम्हारी साधना? तुम्हारी पद्धति क्या है? उन्होंने कहा, पद्धति? वे एक दूसरे की तरफ देखने लगे।
पुरोहित ने कहा, बोलो, तुम करते क्या हो? तुमने साधा क्या है? उन्होंने कहा कि हम ज्यादा तो कुछ भी जानते नहीं। पढ़े—लिखे हम हैं नहीं। किसी ने हमें सिखाया नहीं। हमारी तो एक छोटी—सी प्रार्थना है, वही हम करते हैं। पर वे बड़े संकोच में भर गए कि इतने बड़े पुरोहित को कैसे…! उन्होंने कहा, फिर प्रार्थना भी हमारी खुद की ही गढ़ी हुई है, क्योंकि हमने किसी से सीखा नहीं और किसी ने हमें कभी बताया नहीं। क्या है तुम्हारी प्रार्थना? पुरोहित तो अकड़ता चला गया। उसने कहा कि बिलकुल ही गंवार हैं! क्या है तुम्हारी प्रार्थना? उन्होंने कहा कि अब आपसे हम कैसे कहें, बड़ी छोटी—सी है। हमने सुन रखा है कि परमात्मा तीन हैं, ट्रिनिटि, त्रिमूर्ति।
ईसाई मानते हैं, तीन हैं परमात्मा—परम पिता, उसका बेटा जीसस और दोनों के बीच में एक पवित्र आत्मा, होली घोस्ट—इन तीन के जोड़ से परमात्मा बना है, ट्रिनिटि। जैसा हम त्रिमूर्ति मानते हैं —शंकर विष्णु, ब्रह्मा।
तो उन्होंने कहा कि हमने एक प्रार्थना बना ली सोच—सोचकर तीनों ने। हमारी प्रार्थना यह है कि यू आर थ्री, वी आर ऑल्सो थ्री, हैव मर्सी ऑन अस। तुम भी तीन हो, हम भी तीन हैं, हम पर कृपा करो।
उस पुरोहित ने कहा कि बंद करो यह। यह कोई प्रार्थना है! प्रार्थना तो ऑथराइड होती है। चर्च के द्वारा उसके लिए स्वीकृति और प्रमाण होना चाहिए। तो मैं तुम्हें प्रार्थना बताता हूं। इसको याद करो और आज से यह प्रार्थना शुरू करो। उन्होंने कहा, आपकी कृपा, बता दें। महापुरोहित ने, लंबी प्रार्थना थी चर्च की, वह बताई।
उन लोगों ने कहा कि क्षमा करें, हम बिलकुल गंवार हैं, इतनी लंबी याद न रहेगी। आप थोड़ा संक्षिप्त क़र दें, कुछ थोड़ा सरल! पुरोहित ने कहा कि न तो यह सरल हो सकती है और न संक्षिप्त। यह प्रमाणित प्रार्थना है। और जो इसको नहीं करेगा, उसके लिए स्वर्ग के द्वार बंद हैं। तो उन्होंने कहा कि एक दफा आप फिर से दोहरा दें, ताकि हम याद कर लें। दुबारा कही। फिर भी उन्होंने कहा, एक बार और सिर्फ दोहरा दें। और तीनों ने दोहराने की भी कोशिश की और उन्होंने धन्यवाद दिया पुरोहित को, फिर चरण छुए। पुरोहित प्रसन्न नाव पर वापस लौटा।
आधी झील में आया था कि देखा कि पीछे से एक बवंडर चला आ रहा है पानी पर। वह तो घबड़ाया कि यह क्या चला आ रहा है? थोड़ी देर में साफ हुआ कि वे तीनों पानी पर दौड़ते चले आ रहे हैं! पुरोहित के तो प्राण निकल गए। वे पानी पर चल रहे हैं! और तीनों आकर पास, पकड़कर बोले कि एक बार और दोहरा दें। वह हम भूल गए। हम गरीब बेपढ़े—लिखे लोग। उस पुरोहित ने कहा कि क्षमा करो। तुम्हारी प्रार्थना काम कर रही है। तुम अपनी वही जारी रखो कि वी आर श्री, यू आर श्री, हैव मर्सी ऑन अस।
प्रेम एक हार्दिक घटना है। न तो उसकी कोई प्रामाणिक व्यवस्था है; न कोई विधि है, न कोई तंत्र है न कोई मंत्र है। प्रेम एक हार्दिक भाव है। प्रार्थना एक हार्दिक भाव है। उसे सिखाने का कोई भी उपाय नहीं है। और पृथ्वी पर चूंकि सभी धर्म सिखाने की कोशिश कर रहे हैं, इसलिए लोग अधार्मिक हो गए हैं। सिखाने से कभी भी कोई आदमी धार्मिक नहीं हो सकता।
ओशो; कठोउपनिषद उपनिषद

सोमवार, 19 अक्टूबर 2015

मुल्ला नसरुद्दीन पत्नी की तलाश में था। चाहता था, बहुत सुंदर स्त्री मिल जाए। लेकिन जब शादी कर के लौटा तो एक बहुत कुरूप स्त्री ले आया। तो मित्रों ने उससे पूछा कि यह तुमने क्या किया? उसने कहा, बड़ी मुसीबत हो गयी। जिस आदमी के घर में लड़की को देखने गया था, उस आदमी ने मुझसे कहा कि मेरी चार लड़कियां हैं। पहली लड़की की उम्र पच्चीस साल है। और उसके लिए मैंने पच्चीस हजार रुपए की दहेज की व्यवस्था कर रखी है। वह लड़की बड़ी सुंदर थी। लेकिन मैंने उस आदमी से पूछा कि तुम्हारी और लड़कियों के संबंध में क्या खबर है? तो कहा, दूसरी लड़की की उम्र तीस साल है। उसके लिए मैंने तीस हजार की व्यवस्था कर रखी है। तीसरी की उम्र पैंतीस साल है, उसके लिए मैंने पैंतीस की व्यवस्था कर रखी है। और वह आदमी डरा चौथी की उम्र बताने में। लेकिन मैंने पूछा, तुम चौथी के संबंध में भी निःसंकोच कहो। उसने कहा, उसकी उम्र पचास साल है। और मैंने उसके लिए पचास हजार की व्यवस्था कर रखी है। तो मुल्ला नसरुद्दीन ने कहा कि मुझे पता ही नहीं कैसे मेरे मुंह से निकल गया! मैंने उनसे पूछा, और लड़की नहीं है तुम्हारी, जिसकी उम्र साठ साल हो? और मैं पचास वर्ष की औरत से शादी कर के घर लौट आया। यह तो रास्ते में ही मुझे पता चला कि यह मैंने क्या कर लिया।
लेकिन मन बहुत खंड है। एक खंड सौंदर्य को मांगता है, एक खंड धन को मांगता है। इसलिए तुम अपने मन पर भरोसा मत करना। तुम कुछ लेने जाओगे, कुछ ले कर लौट आओगे। और तुम्हें बहुत बार ऐसा हुआ है कि बाजार तुम लेने कुछ गए थे और ले कर तुम कुछ लौट आए। इस पृथ्वी पर भी तुम कुछ और ही लेने आते हो, और कुछ और ही ले कर लौट जाते हो। तुम अपने मन पर भरोसा मत करना। तुमने अगर अपने मन का भरोसा किया, तो तुम कहीं के न रह जाओगे। मन का भरोसा अगर तुमने किया, तो तुम खंड-खंड हो जाओगे, पारे की तरह टूट जाओगे।
ओशो