शनिवार, 31 दिसंबर 2011

जीवन पथ का एक पडाव फिर पूर्ण हुआ / नए उत्साह नए विश्वास से जीवन पथ के अगले पडाव की ओर कदम बडाए / सभी मित्रों को नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ

रविवार, 11 दिसंबर 2011

जो चीज हर आदमी को दिखती है / वह सरकार को क्यों नहीं दिखती है / अब हर आदमी महगाई से मर रहा है पर सरकार का कहना की कोई महगाई नही है/  बिजली से  आदमी वे हाल है /पर सरकार कहती है हम भरपूर बिजली उत्पादन कर रहे है / अन्ना लोकपाल मांगते है /तो सरकार कहती है वह हमे सुचारू रूप से देश को नही चलाने दे रहे है /

शुक्रवार, 28 अक्टूबर 2011

मान्यता में मनुष्य भूला है / मान्यता के अतिरिक्त कही कोई भ्रान्ति नही है / तुमने मान रखा है की मै हूँ / न केवल मान रखा है वरन तुम इसे सब भांति पुष्ट करते हो / धन से ,पद से , प्रतिष्ठा से , इसे पोषण देते हो कोई इस पर चोट करे मरने को तैयार हो जाते हो / तुम अपने अहंकार की रक्षा मे सतत तैनात हो , नंगी तलवार लिए / और कभी अगर तुम्हे मजबूरी में झुकना भी पड़ता है तो झुकना ऊपर ऊपर होता है भीतर तुम बदले की प्रतीक्षा करते हो / कब मिले समय , कब आये अवसर की जिसके सामने तुम्हे झुकना पड़ा है तुम उसे झुका लो ?[ ओशो से ]                  

बुधवार, 26 अक्टूबर 2011

सभी मित्रो को दीपावली के पावन पर्व पर  हार्दिक शुभ कामना

गुरुवार, 15 सितंबर 2011

कोई भी परिस्थिति कितनी ही विकट क्यों न हो, बदल जाती है. वह हमेशा नहीं
रहती. इसीलिए जंगल की विकराल आग देरसबेर ख़त्म हो जाती है; उथल-पुथल भरे
समुद्र में लहरें थम जाती हैं. प्रकृति की सभी घटनाएं अपने विलोम को
खोजती हैं और साम्य को प्राप्त कर लेती हैं. यह संतुलनकारक  प्रक्रिया ही
हर उपचार का हृदयबिंदु है.

लेकिन हर प्रक्रिया अपना समय लेती है. यदि कोई घटना विशाल नहीं है तो
संतुलन कायम करने के लिए कुछ विशेष नहीं करना पड़ता. कोई बड़ी बात हो जाए
तो चीज़ों को अपनी धुरी तक लौटने में कई, दिन, महीने, साल, या जीवन भर भी
लग सकता है. दूसरी ओर यह भी सच है कि जीवन में छोटे-छोटे असंतुलन न हों
तो इसकी गति बड़ी नीरस हो जाती है. चढ़ाव और उतार पर चलती गाड़ी में ही
यात्रा का आनंद आता है. सम्पूर्ण केन्द्रिकता और सम्पूर्ण संतुलन हमेशा
संचार-रोध ले आते हैं. पूरा जीवन ध्वंस और उपचार की सतत धारा है.

यही कारण है कि विषम से विषम परिस्थितियों से घिरे रहने के बाद भी
ज्ञानीजन शांत रहते हैं. वह परिस्थिति चाहे जो हो – बीमारी, आपदा, या
क्रोध की अवस्था – वे जानते हैं कि रोग के बाद उसका निदान और उपचार भी
होगा............................

[ ओशो ] द्वारा ......

सोमवार, 25 जुलाई 2011

जीवन वरदान

आसमान से गिरती पानी की  बूंदे प्रक्रति का जीवन वरदान ही तो है / परमात्मा का निर्मल रूप है आसमान से गिरती पानी की बूंदे / ऐसा कौन अभागा इस धरा पर होगा जिसने  रिमछिम बारिश का खुले आसमान तले परम आनन्द न लिया हो/ पेड़ो का नई कोपलो के साथ लहराना नन्ही दूर्वा का हरी चुनरिया ओढना नन्हे बच्चो का आसमान से गिरती बूंदों को पकड़ना और उन का उन्मुक्त करलव करते  देखना ईश्वर दर्शन करना ही है

शनिवार, 2 जुलाई 2011

हर वक्‍त

हर वक्‍त कौन चलता है

एक दिन बाद्शाह ने दरबारियों से पूछा कि हर समय कौन चलता है उत्तर मे किसी ने पृथ्वी, किसी ने चन्द्रमा को बताया तथा किसी ने हवा आदि को बताया ।

बादशाह ने यह प्रश्‍न बीरबल से पूछा तो उन्होने उत्तर दिया की अली जहां ! महाजन का ब्याज हर समय चलता रह्ता है इसे कभी थकावट नही होती। दिन दुगनी और रात चौगुनी वेग से चलता है । बाद्शाह को यह उत्तर पसंद आया। 

रविवार, 5 जून 2011

सरकार किस हद तक विवेक शून्य हो चुकी है इस का उदाहरन दिल्ली के रामलीला मैदान में देखने को कल मिला / सरकार रूपी रथ को बेलगाम मंत्री रूपी अश्व अँधेरी  खाई की तरफ सतत्त लिए जा रहे है
कोई भी सभ्य सरकार अपने ही नागरिको पर रात्रि 1 बजे सोते मे पाशविक तरीके से कार्यवाही नही कर सकती /
                              जरनल डायर ने तो कम से कम शूट आउट दिन के उजाले में किया था ????? 
                      
                      

बुधवार, 20 अप्रैल 2011

चौपट राजा

मैंने सुना है की हमारी केंद्र सरकार खाना की वर्बादी रोकने हेतु एक कानून बनाने जा रही है/  अच्छी बात है? क्या हमारे नेता हम से मजाक तो नही कर रहे है यदि मजाक नही है तो उन्हें उस अन्न की फ़िक्र करना चाहिए जो प्रति वर्ष खुले  आसमान के तले रखा रहता है और वरसात  के मौसम में सड़ जाता है उसके उचित भंडारण की व्यवस्था करना चाहिए ताकि लाखो लोगो के पेट की भूख हो सके / सरकार की मंशा सार्वजनिक समारोहों के दौरान खाने में केवल एक डिश परोसी जावे / अरे भई एक डिश बने या अनेक आदमी भूखा तो रहेगा नही वह उतना ही खाता है जितनी पेट की क्षमता रहती है / उन फाइव स्टार होटलों का क्या होगा जहा खाना की कीमत प्रति प्लेट से तय होती है वह वन डिश कानून चल पायेगा ? सरकार को लोकपाल बिल तरह ही एक डिशपाल बिल संसद में लाना चाहिए जो सारे देश में वन डिश फार्मूला लागू करेगा देश में कही भी किसी भी शादी समारोह या मत्यु भोज में जाकर जाँच करेगा की कही ज्यादा डिशे तो नही बनी यदि बनी तो खिलाने वाला जेल के अंदर // वैसे गरीब तो वनडिश का पालन जन्मजात करते है कभी खिचड़ी कभी दलिया तो कभी सूखी रोटी // अंधेर नगरी चौपट राजा = टका सेर भाजी टका सेर खाजा // ??????????

गुरुवार, 7 अप्रैल 2011

भ्रस्टाचार

अन्ना हजारे जी का अनशन एक क्रांति का अंकुरण है / आज की युवा पीढी ने गांधी जी को नही देखा है उन्हे अन्ना हजारे जी के दर्शन जरुर करना चाहिए 

शुक्रवार, 1 अप्रैल 2011

मेरी भी कामना

अब तो मज़हब कोई ऐसा भी चलाया जाए।
जिसमें इंसान को इंसान बनाया जाए।
जिसकी ख़ुशबू से महक जाय पड़ोसी का भी घर
फूल इस क़िस्म का हर सिम्त खिलाया जाए।
आग बहती है यहाँ गंगा में झेलम में भी
कोई बतलाए कहाँ जाके नहाया जाए।
प्यार का ख़ून हुआ क्यों ये समझने के लिए
हर अँधेरे को उजाले में बुलाया जाए।
मेरे दुख-दर्द का तुझ पर हो असर कुछ ऐसा
मैं रहूँ भूखा तो तुझसे भी न खाया जाए।
जिस्म दो होके भी दिल एक हों अपने ऐसे
मेरा आँसु तेरी पलकों से उठाया जाए।
गीत उन्मन है, ग़ज़ल चुप है, रूबाई है दुखी
ऐसे माहौल में ‘नीरज’ को बुलाया जाए।
गोपालदास “नीरज” 

शुक्रवार, 25 मार्च 2011

संन्यास

संन्यासी [ साधू ] होना आज कल फैशन हो गया है या यह कहे की पैसा कमाने का एक सुलभ जरिया हो गया है मठो की आपसी होड़ / संन्यासियों  के सर्वसुविघा युक्त मठ किस दिशा के प्रतीक है / सच्चा  संन्यसी तो हमारे आपके पडोस में ही रहता है जो अपना जीवन परिजनों की सेवा एवम समाजिक दायुत्य पूरा में लगा देता  है / समाज एवम परिजनों से भागा आदमी कभी संन्यसी नही हो सकता /  हाँ ढोगी जरुर हो सकता  है /

सोमवार, 14 मार्च 2011

होली

हर साल की तरह  इस वर्ष भी होली आ रही है /  हम सारी जिन्दगी दूसरो पर अपना रंग जमाने में ही तो लगे रहते है हमे पता होता है हम अंदर से  क्या है ओर बहार से क्या है पर चेहरे पर दूसरा रंग लिए जिए जाते है /  [रंग]  है ही उस  चीज का नाम जो असलियत न दिखने दे / 

बुधवार, 16 फ़रवरी 2011

किसान


 हमारे प्रदेश में बड़ा विचित्र समय चल रहा है किसान आत्महत्या कर रहे है राजनेता एक दुसरे के खिलाफ अनशन पर बैठ रहे है किसान आत्महत्या के पीछे हमारी व्यवस्था भी दोसी है हमारे देश में उत्पादक ही अपने उत्पादन कि कीमत तय कर बजार में बेचता है परन्तु किसान के उत्पादन कि कीमत व्यापारी तय करता है ओर व्यापारी वह कीमत तय करता जिसमे उसे ज्यादा से ज्यादा फायदा हो / किसान लाचार जाये तो कहा जाये उसके पास विकल्प ही नही होता / ओर इस सारे झमेले  में छोटे किसान को आत्महत्या के सिवाय दूसरा रास्ता नही बचता है भगवान हमारे राजनेताऔ को जल्द से जल्द सदबुध्धि दे /  यदि वर्ष २०१० -२०११ में जो पैसा भ्रष्ट अधिकारऔ से जप्त हुआ है उसे किसानो में बाट दिया जावे तो प्रदेश का किसान थोडा तो खुशहाल होगा????????

सोमवार, 17 जनवरी 2011

सेवा

सेवा शब्द बड़ा ही विन्रम भाव लिऐ होता है मन्दिर में पुजारी भगवान कि सेवा करता है और कई मन्दिरों में तो पुजारी सेवा को लेकर आपस में लड़ते है भले उन के माँ बाप सेवा के आभाव में इस लोक से गमन कर गये हो - यही सेवा का जज्बा हमारे नेताओं में देश के लिऐ है मैंने सेवा भाव पर  कदम्नी पत्रिका में  एक कहानी कई साल पहले पढ़ी थी लेखक थे राजेन्द्र अवस्थी जी   जो इस प्रकार थी      एक बार भू लोक मै भारी हा हा कार मचा क्योकि देवभूमि पर राक्षसों का राज कायम हो गया था इस राज को कैसे उखाड़ फैका जाय सभी ने विचार किया और विचार ये निकला कि भगवान जो इस समय सो रहे है उन्हें जगाकर इस आफत के बारे में  बताया जाय / भगवान जगे और अपनी शक्ति से राक्षसों को देवभूमि से खदेड़ दिया / चूकि भगवान  सोकर उठे थे सो सेवा को लेकर  अब भक्त आपस में लड़ने लगे / लड़ता देख  भगवान ने कहा आप लोग  एक काम करो कि वोट डाल लो जिसे ज्यदा वोट मिले वही मेरी सेवा पूजा पांच वर्ष तक  करेगा /  सभी सहमत हुए / तभी से जो जीत रहा है वही भगवान कि सेवा पूजा कर रहा है और प्रसादी  खा रहा है  

गुरुवार, 6 जनवरी 2011

फल तो चखना ही पड़े........


हम सभी को एक बात हमेशा याद रखना चाहिए कि जो भावनाए - प्रतिक्रिया चाहे वे सकारात्मक हो या नकारात्मक या हिंसा से भरी हो हम दुसरे के प्रति रखेगे उनका प्रतिफल या यो कहे उस क्रिया का फल हमे जरुर ही चखना पड़ेगा चाहे वक्त कितना ही लगे अब ये हमारे उपर है कि फल को मीठा बनाये या कडवा खाना हम को ही है  / मेरी सोच से तो सारी बुराई कि जड़ हमारा  मुंह है जो फट से किसी बात या व्यक्ति - समाज - देश के वारे में चल जाता है और उस का नतीजा हम तो भोगते ही है आने वाली पीढी भरपाई करती है महाभारत भी द्रोपती के मुंह से कटाक्ष निकलने कारण हुआ  था भाई ...............

मंगलवार, 4 जनवरी 2011

खुशी और ...........

 
शायद खुशी और अहम (अहंकार) सगे भाई बहिन है जब घर में पुत्र जन्म होता है तो भारी उत्सव मनाया जाता है पिता से लेकर दादा परदादा स्वर्ग या नर्क बैठे पित्तर भी खुश हो जाते है और इसी ख़ुशी में हमारा अहंकार छुपा होता है / जब पुत्र की शादी होती है तो घर में चारो तरफ ख़ुशी का माहौल होता है पर इस में असल हमारा अहंकार छुपा होता है प्राय: घर के प्रत्येक सदस्य को शासक का दर्जा प्राप्त हो जाता है / ख़ुशी के उप्लछय--- का नाम देकर जो हम एक से बढ़कर एक दावते गांव के चौपालों  से शहर के पांच सितारा होटलों देते है इस काम में भी अहंकार तुष्ठी छुपी होती है की मैंने .......किया था / जब कोई सरपंच या विधायक - सांसद - मंत्री बनता है तो उन के परिजन मित्र भारी ख़ुशी मनाते है क्योकि अब समाज में उन का अहंकार और प्रवलता से खड़ा होगा

सोमवार, 3 जनवरी 2011

जीवन

 
वर्ष  2010  बीत गया नये वर्ष का स्वागत हो रहा है-- क्या हमारे जीवन एक कदम मौत तरफ और नहीं बढ़ा?? समझ से परे है हम स्वागत किस का कर रहे है जीवन या मृत्यु  का सृजन या विनाश का/ आखिर जीवन है ही कहा जिस क्षण हम सांस लेना शुरू करते है हर सांस हमे मृत्यु निकट ही  तो ले जा रही होती है