शुक्रवार, 11 दिसंबर 2015

।। दान ।।

एक संत ने एक द्वार पर दस्तक दी और आवाज लगाई " भिक्षां देहि "।
▬ एक छोटी बच्ची बाहर आई और बोली,
‘‘बाबा, हम गरीब हैं, हमारे पास देने को कुछ नहीं है।’’
संत बोले, ‘‘बेटी, मना मत कर, अपने आंगन की धूल ही दे दे।’’
लड़की ने एक मुट्ठी धूल उठाई और भिक्षा पात्र में डाल दी।
शिष्य ने पूछा, ‘‘गुरु जी, धूल भी कोई भिक्षा है? आपने धूल देने को क्यों कहा?’’
संत बोले, ‘‘बेटे, अगर वह आज ना कह देती तो फिर कभी नहीं दे पाती।
आज धूल दी तो क्या हुआ, देने का संस्कार तो पड़ गया। आज धूल दी है, उसमें देने की भावना तो जागी ! कल समर्थवान होगी तो फल-फूल भी देगी।’’
जितनी छोटी कथा है निहितार्थ उतना ही विशाल...
साथ में आग्रह भी ....
दान करते समय दान हमेशा अपने परिवार के छोटे बच्चों के हाथों से दिलवाये ....जिससे उनमें देने की भावना बचपन से बने l

सोमवार, 30 नवंबर 2015

निदा फ़ाज़ली जी

: पेरिस हमले पर आज निदा फ़ाज़ली जी के ये दो
शेर याद आ रहे हैं -
हर बार ये इल्ज़ाम रह गया..!
हर काम में कोई काम रह गया..!!
नमाज़ी उठ उठ कर चले गये मस्ज़िदों से..!
दहशतगरों के हाथ में इस्लाम रह गया..!!
खून किसी का भी गिरे यहां
नस्ल-ए-आदम का खून है आखिर
बच्चे सरहद पार के ही सही
किसी की छाती का सुकून है आखिर
ख़ून के नापाक ये धब्बे, ख़ुदा से कैसे छिपाओगे?
मासूमों के क़ब्र पर चढ़कर, कौन से जन्नत जाओगे?
कागज़ पर रख कर रोटियाँ, खाऊँ भी तो कैसे . .
. . खून से लथपथ आता है, अखबार भी आजकल .
दिलेरी का हरगिज़ ये काम नहीं है
दहशत किसी मज़हब का पैगाम नहीं है ....!
तुम्हारी इबादत, तुम्हारा खुदा, तुम जानो..
हमें पक्का यकीन है ये कतई इस्लाम नहीं है....
एक साधु व एक डाकू एक ही दिन मरकर यमलोक पहुंचे. धर्मराज उनके कर्मों का लेखा-जोखा खोलकर बैठे थे और उसके हिसाब से उनकी गति का हिसाब करने लगे.
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निर्णय करने से पहले धर्मराज ने दोनों से कहा- मैं अपना निर्णय तो सुनाउंगा लेकिन यदि तुम दोनों अपने बारे में कुछ कहना चाहते हो तो मैं अवसर देता हूं, कह सकते हो.
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डाकू ने हमेशा हिंसक कर्म ही किए थे. उसे इसका पछतावा भी हो रहा था. अतः अत्यंत विनम्र शब्दों में बोला महाराज ! मैंने जीवन भर पापकर्म किए. जिसने केवल पाप ही किया हो वह क्या आशा रखे. आप जो दंड दें, मुझे स्वीकार है.
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डाकू के चुप होते ही साधु बोला महाराज ! मैंने आजीवन तपस्या और भक्ति की है. मैं कभी असत्य के मार्ग पर नहीं चला. सदैव सत्कर्म ही किए इसलिए आप कृपा कर मेरे लिए स्वर्ग के सुख-साधनों का शीघ्र प्रबंध करें.
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धर्मराज ने दोनों की बात सुनी फिर डाकू से कहा- तुम्हें दंड दिया जाता है कि तुम आज से इस साधु की सेवा करो. डाकू ने सिर झुकाकर आज्ञा स्वीकार कर ली.
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यमराज की यह आज्ञा सुनकर साधु ने आपत्ति जताते हुए कहा- महाराज ! इस पापी के स्पर्श से मैं अपवित्र हो जाऊंगा. मेरी तपस्या तथा भक्ति का पुण्य निरर्थक हो जाएगा. मेरे पुण्य कर्मों का उचित सम्मान नहीं हो रहा है.
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धर्मराज को साधु की बात पर बड़ा क्षोभ हुआ. वह क्षुब्ध होकर बोले- निरपराध व्यक्तियों को लूटने और हत्या करने वाला डाकू मर कर इतना विनम्र हो गया कि तुम्हारी सेवा करने को तैयार है.
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तुम वर्षों के तप के बाद भी अहंकार ग्रस्त ही रहे. यह नहीं जान सके कि सब में एक ही आत्मतत्व समाया हुआ है. तुम्हारी तपस्या अधूरी और निष्फल रही. अत: आज से तुम इस डाकू की सेवा करो, और तप को पूर्ण करो.
उसी तपस्या में फल है, जो अहंकार रहित होकर की जाए. अहंकार का त्याग ही तपस्या का मूलमंत्र है और यही भविष्य में ईश्वर प्राप्ति का आधार बनता है. झूठे दिखावे तप नहीं हैं, ऐसे लोगों की गति वही होगी जो साधु की हुई.

गुरुवार, 22 अक्टूबर 2015

टालस्टाय ने एक छोटी सी कहानी लिखी है। टालस्टाय ने लिखा है कि एक झील के किनारे तीन फकीर थे। तीनों बेपढ़े लिखे थे। लेकिन उनकी बड़ी ख्याति हो गई, और दूर दूर से लोग उनके दर्शन करने को आने लगे। तो रूस का जो सबसे बड़ा पुरोहित था, उसके कानों में भी खबर पहुंची कि तीन पवित्र पुरुष झील के उस पार हैं। पर उसने कहा कि मुझे उनका पता ही नहीं! और उन्होंने कभी चर्च में दीक्षा भी नहीं ली, वे पवित्र हो कैसे सकते हैं! और हजारों लोग वहां जा रहे हैं और दर्शन करके कृतार्थ हो रहे हैं! तो वह भी देखने गया कि मामला क्या है?
नाव पर सवार हुआ, झील के उस पर पहुंचा। वे तीनों तो बिलकुल बेपढ़े लिखे गंवार थे। वे अपने झाडू के नीचे बैठे थे। जब महापुरोहित उनके सामने गया तो उन तीनों ने झुककर उसको प्रणाम किया। महापुरोहित तभी आश्वस्त हो गया कि कोई डर की बात नहीं है। जब तीनों चरण छू रहे हैं, इनसे कोई ईसाई—धर्म को खतरा नहीं है। उस महापुरोहित ने कहा कि तुम क्या करते हो? क्या है तुम्हारी साधना? तुम्हारी पद्धति क्या है? उन्होंने कहा, पद्धति? वे एक दूसरे की तरफ देखने लगे।
पुरोहित ने कहा, बोलो, तुम करते क्या हो? तुमने साधा क्या है? उन्होंने कहा कि हम ज्यादा तो कुछ भी जानते नहीं। पढ़े—लिखे हम हैं नहीं। किसी ने हमें सिखाया नहीं। हमारी तो एक छोटी—सी प्रार्थना है, वही हम करते हैं। पर वे बड़े संकोच में भर गए कि इतने बड़े पुरोहित को कैसे…! उन्होंने कहा, फिर प्रार्थना भी हमारी खुद की ही गढ़ी हुई है, क्योंकि हमने किसी से सीखा नहीं और किसी ने हमें कभी बताया नहीं। क्या है तुम्हारी प्रार्थना? पुरोहित तो अकड़ता चला गया। उसने कहा कि बिलकुल ही गंवार हैं! क्या है तुम्हारी प्रार्थना? उन्होंने कहा कि अब आपसे हम कैसे कहें, बड़ी छोटी—सी है। हमने सुन रखा है कि परमात्मा तीन हैं, ट्रिनिटि, त्रिमूर्ति।
ईसाई मानते हैं, तीन हैं परमात्मा—परम पिता, उसका बेटा जीसस और दोनों के बीच में एक पवित्र आत्मा, होली घोस्ट—इन तीन के जोड़ से परमात्मा बना है, ट्रिनिटि। जैसा हम त्रिमूर्ति मानते हैं —शंकर विष्णु, ब्रह्मा।
तो उन्होंने कहा कि हमने एक प्रार्थना बना ली सोच—सोचकर तीनों ने। हमारी प्रार्थना यह है कि यू आर थ्री, वी आर ऑल्सो थ्री, हैव मर्सी ऑन अस। तुम भी तीन हो, हम भी तीन हैं, हम पर कृपा करो।
उस पुरोहित ने कहा कि बंद करो यह। यह कोई प्रार्थना है! प्रार्थना तो ऑथराइड होती है। चर्च के द्वारा उसके लिए स्वीकृति और प्रमाण होना चाहिए। तो मैं तुम्हें प्रार्थना बताता हूं। इसको याद करो और आज से यह प्रार्थना शुरू करो। उन्होंने कहा, आपकी कृपा, बता दें। महापुरोहित ने, लंबी प्रार्थना थी चर्च की, वह बताई।
उन लोगों ने कहा कि क्षमा करें, हम बिलकुल गंवार हैं, इतनी लंबी याद न रहेगी। आप थोड़ा संक्षिप्त क़र दें, कुछ थोड़ा सरल! पुरोहित ने कहा कि न तो यह सरल हो सकती है और न संक्षिप्त। यह प्रमाणित प्रार्थना है। और जो इसको नहीं करेगा, उसके लिए स्वर्ग के द्वार बंद हैं। तो उन्होंने कहा कि एक दफा आप फिर से दोहरा दें, ताकि हम याद कर लें। दुबारा कही। फिर भी उन्होंने कहा, एक बार और सिर्फ दोहरा दें। और तीनों ने दोहराने की भी कोशिश की और उन्होंने धन्यवाद दिया पुरोहित को, फिर चरण छुए। पुरोहित प्रसन्न नाव पर वापस लौटा।
आधी झील में आया था कि देखा कि पीछे से एक बवंडर चला आ रहा है पानी पर। वह तो घबड़ाया कि यह क्या चला आ रहा है? थोड़ी देर में साफ हुआ कि वे तीनों पानी पर दौड़ते चले आ रहे हैं! पुरोहित के तो प्राण निकल गए। वे पानी पर चल रहे हैं! और तीनों आकर पास, पकड़कर बोले कि एक बार और दोहरा दें। वह हम भूल गए। हम गरीब बेपढ़े—लिखे लोग। उस पुरोहित ने कहा कि क्षमा करो। तुम्हारी प्रार्थना काम कर रही है। तुम अपनी वही जारी रखो कि वी आर श्री, यू आर श्री, हैव मर्सी ऑन अस।
प्रेम एक हार्दिक घटना है। न तो उसकी कोई प्रामाणिक व्यवस्था है; न कोई विधि है, न कोई तंत्र है न कोई मंत्र है। प्रेम एक हार्दिक भाव है। प्रार्थना एक हार्दिक भाव है। उसे सिखाने का कोई भी उपाय नहीं है। और पृथ्वी पर चूंकि सभी धर्म सिखाने की कोशिश कर रहे हैं, इसलिए लोग अधार्मिक हो गए हैं। सिखाने से कभी भी कोई आदमी धार्मिक नहीं हो सकता।
ओशो; कठोउपनिषद उपनिषद

सोमवार, 19 अक्टूबर 2015

मुल्ला नसरुद्दीन पत्नी की तलाश में था। चाहता था, बहुत सुंदर स्त्री मिल जाए। लेकिन जब शादी कर के लौटा तो एक बहुत कुरूप स्त्री ले आया। तो मित्रों ने उससे पूछा कि यह तुमने क्या किया? उसने कहा, बड़ी मुसीबत हो गयी। जिस आदमी के घर में लड़की को देखने गया था, उस आदमी ने मुझसे कहा कि मेरी चार लड़कियां हैं। पहली लड़की की उम्र पच्चीस साल है। और उसके लिए मैंने पच्चीस हजार रुपए की दहेज की व्यवस्था कर रखी है। वह लड़की बड़ी सुंदर थी। लेकिन मैंने उस आदमी से पूछा कि तुम्हारी और लड़कियों के संबंध में क्या खबर है? तो कहा, दूसरी लड़की की उम्र तीस साल है। उसके लिए मैंने तीस हजार की व्यवस्था कर रखी है। तीसरी की उम्र पैंतीस साल है, उसके लिए मैंने पैंतीस की व्यवस्था कर रखी है। और वह आदमी डरा चौथी की उम्र बताने में। लेकिन मैंने पूछा, तुम चौथी के संबंध में भी निःसंकोच कहो। उसने कहा, उसकी उम्र पचास साल है। और मैंने उसके लिए पचास हजार की व्यवस्था कर रखी है। तो मुल्ला नसरुद्दीन ने कहा कि मुझे पता ही नहीं कैसे मेरे मुंह से निकल गया! मैंने उनसे पूछा, और लड़की नहीं है तुम्हारी, जिसकी उम्र साठ साल हो? और मैं पचास वर्ष की औरत से शादी कर के घर लौट आया। यह तो रास्ते में ही मुझे पता चला कि यह मैंने क्या कर लिया।
लेकिन मन बहुत खंड है। एक खंड सौंदर्य को मांगता है, एक खंड धन को मांगता है। इसलिए तुम अपने मन पर भरोसा मत करना। तुम कुछ लेने जाओगे, कुछ ले कर लौट आओगे। और तुम्हें बहुत बार ऐसा हुआ है कि बाजार तुम लेने कुछ गए थे और ले कर तुम कुछ लौट आए। इस पृथ्वी पर भी तुम कुछ और ही लेने आते हो, और कुछ और ही ले कर लौट जाते हो। तुम अपने मन पर भरोसा मत करना। तुमने अगर अपने मन का भरोसा किया, तो तुम कहीं के न रह जाओगे। मन का भरोसा अगर तुमने किया, तो तुम खंड-खंड हो जाओगे, पारे की तरह टूट जाओगे।
ओशो

शनिवार, 3 अक्टूबर 2015


मैंने सुना है, मुल्ला नसरुद्दीन अपनी पत्नी को लेकर हवाई-अड्डे पर गया। वहां सौ रुपये में पूरे गांव का चक्कर लगवाने की व्यवस्था थी। अनेक लोग उड़े, वापिस लौट गये, पायलट देखता रहा कि मुल्ला नसरुद्दीन और उसकी पत्नी दोनों खड़े विचार करते हैं; हिम्मत नहीं जुटा पाते हैं। सौ रुपया! जब कोई भी न रहा और सारे उड़नेवाले जा चुके तो वह पायलट उतर कर आया और उसने कहा कि कंजूस मैंने बहुत देखे। अब तुम कब तक सोचते रहोगे? बंद होने का समय भी आ गया।
दोनों नसरुद्दीन पति-पत्नी एक दूसरे की तरफ देखने लगे। बड़ी आकांक्षा कि एक दफा हवाई जहाज में उड़ लें; लेकिन सौ रुपये को छोड़ना!
आखिर पायलट को दया आ गई। उसने कहा, तुम एक काम करो। मैं तुम्हें मुफ्त घुमा देता हूं, लेकिन एक शर्त है। और वह शर्त यह है कि तुम एक भी शब्द बोलना मत। अगर तुम एक भी शब्द बीच में बोले, तो सौ रुपये देना पड़ेंगे। नसरुद्दीन प्रसन्न हो गया और उसने कहा कि बिलकुल ठीक!
वे दोनों बैठे। पायलट ने बड़ी बुरी तरह खतरनाक ढंग से हवाई जहाज उड़ाया। उलटा, नीचा, तिरछा, कलाबाजियां कीं, और बड़ा हैरान हुआ कि सब मुसीबत में वे चुप रहे दोनों। कई दफा जान को खतरा भी आ गया होगा, उलटे हो गये, लेकिन वे चुप ही रहे। नीचे उतर कर उसने कहा कि मान गये नसरुद्दीन! तुम जीत गये। पर उसने कहा, ‘तुम्हारी पत्नी कहां है?’
नसरुद्दीन ने कहा, ‘ऐसा वक्त भी आया जब मैं बोलने के करीब ही था, लेकिन संयम बड़ी चीज है। मेरी पत्नी तो गिर गई। तब मैं बिलकुल बोलने के करीब था लेकिन संयम बड़ी चीज है, शास्त्रों में कहा है। मैंने बिलकुल सांस रोक कर आंख बंद करके संयम रखा है। और संयम का फल सदा मीठा होता है। दोहरे फायदे हुए। सौ रुपया भी बचा, पत्नी से झंझट भी मिटी। संयम का फल मीठा है।’
संयम का अर्थ है जबर्दस्ती। तो तुम यह भी कर सकते हो कि तुम्हारा मन तो था शाही वस्त्र पहनने का और तुमने संयम से लंगोटी लगा ली। यह सादा जीवन नहीं है। इसमें चेष्टा है। इसमें समझ नहीं है, इसमें प्रयास है। और तुम्हें लंगोटी को थोपने के लिए अपने ऊपर निरंतर जद्दोजहद करनी पड़ेगी। मन की आकांक्षा तो शाही वस्त्रों की थी। तुमने किसी प्रलोभन के वश, स्वर्ग, ईश्वर का दर्शन, योग, अमृत, कुछ पाने की आकांक्षा में लंगोटी लगा ली।
ध्यान रहे, संयम सदा लोलुपता का अंग है। तुम कुछ पाना चाहते हो, इसीलिए तुम्हें कुछ करना पड़ता है। सादगी लोलुपता से मुक्ति है। सादा आदमी वह है जिसे लंगोटी लगाने में आनंद आ रहा है। वह कोई संयम नहीं है। उसके भीतर कोई संघर्ष नहीं चल रहा है, कि पहनूं शाही वस्त्र, और वह लंगोटी लगा रहा है। कोई लड़ाई नहीं है। सादा आदमी अपने भीतर लड़ता नहीं। और जो भी लड़ता है, वह जटिल है।
दिया तले अँधेरा
ओशो

शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2015

आदमी या शैतान 


कभी एक आदमी बहुतेरी मुसीबतों से घिरा हुआ था. उसने एक दिन शुद्ध मन से
यह प्रतिज्ञा करी कि यदि उसे मुसीबतों से निजात मिल जायेगी तो वह अपना घर
बेचकर सारा पैसा गरीबों में बाँट देगा.
देर-सबेर उस आदमी की मुसीबतें टल गईं और उसे अपनी प्रतिज्ञा का स्मरण हो
आया. अच्छे दिन लौट आने के बाद अब उसका दिल इस बात की इज़ाज़त नहीं दे रहा
था कि वह अपनी सारी दौलत दान में दे दे. कुछ सोचने के बाद उसे एक उपाय
सूझ गया.
उसने घर के सामने इश्तिहार लगा दिया. उसमें लिखा था कि घर की कीमत सिर्फ
पांच मोहरें थी. लेकिन घर के साथ एक बिल्ली को खरीदना ज़रूरी था जिसकी
कीमत उसने दस हज़ार अशर्फियाँ रखी थी.
एक मालदार शख्स ने घर और बिल्ली दोनों को खरीद लिया. आदमी ने पांच मोहरें
गरीबों में बाँट दीं और दस हज़ार अशर्फियों से नया घर खरीद लिया.