मान्यता में मनुष्य भूला है / मान्यता के अतिरिक्त कही कोई भ्रान्ति नही है / तुमने मान रखा है की मै हूँ / न केवल मान रखा है वरन तुम इसे सब भांति पुष्ट करते हो / धन से ,पद से , प्रतिष्ठा से , इसे पोषण देते हो कोई इस पर चोट करे मरने को तैयार हो जाते हो / तुम अपने अहंकार की रक्षा मे सतत तैनात हो , नंगी तलवार लिए / और कभी अगर तुम्हे मजबूरी में झुकना भी पड़ता है तो झुकना ऊपर ऊपर होता है भीतर तुम बदले की प्रतीक्षा करते हो / कब मिले समय , कब आये अवसर की जिसके सामने तुम्हे झुकना पड़ा है तुम उसे झुका लो ?[ ओशो से ]