मृत्यु शैय्या पर पड़े अपने पिता के पास मुल्ला नसरूद्दीन खड़ा था. पिता ने मरते स्वरों में मुल्ला को ज्ञान देना चाहा - "बेटे, हमेशा ध्यान रखना कि धन से सुख नहीं मिलता है.."
"जी पिता जी मैं ध्यान रखूंगा", मुल्ला ने सहमति दर्शाई - "परंतु धन से दुख की मात्रा अपने अनुरूप की जा सकती है"
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